राजनीति

उत्तर प्रदेश में बिछी सत्ता की चौसर , कोई शकुनी है तो कोई युधिष्ठिर

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शरद गुप्ता

राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष अजित सिंह आजकलबहुत व्यस्त हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने में बमुश्किल नौ महीने बचे हैंऔर उनकी पार्टी का गठबंधन पक्का नहीं हो पा रहा है।

वे सुबह कांग्रेस-जद (यू) सेबात कर रहे है, दोपहर को समाजवादी पार्टी से तो शाम को बीजेपी से। बीजेपी ने भी यूपीफ़तह के लिए सघन रणनीति बनाई है।

कमान पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने अपने हाथ में रखी है। वहीं कांग्रेस को इस बार प्रियंका गांधीके नाम और काम का सहारा है। तो बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने तीन महीने पहले ही सभी४०३ टिकट बांट कर उम्मीदवारों को सघन प्रचार में जुट जाने के निर्देश दे दिए हैं।

आख़िर यूपी है ही इतना महत्वपूर्ण।दिल्ली और बिहार में हार के बाद बीजेपी के लिए यूपी जीतना इसलिए जरूरी है क्योंकिवहीं की ८० लोकसभा सीटों से ही प्रशस्त होगी मोदीजी की २०१९ के लोकसभा चुनाव कीराह।

इसलिए पहले नंबर की लड़ाई में बीजेपी खुद को देखना चाहती है।

लेकिन हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण केमुताबिक बसपा को लगभग १६०-१८० सींटें आती दिख रही हैं। बीजेपी को ११५-१२५, सपा को ७५-९० औरकांग्रेस को ३०-४० सीटें दी गई हैं।

हालांकि इन दलों को अपना आकलन इससे भिन्न है।बीजेपी का मानना है कि आज वह १५०-१६० सीटों पर है और थोड़ा सा मेहनत करने पर सरकारबनाने की स्थिति में आ सकती है।

बीजेपी ने दो साल पहले हुए लोकसभा चुनाव मेंसहयोगी पार्टी अपना दल के साथ मिलकर राज्य की लोकसभा की ८० में से ७३ सीटें जीत कर एक रिकॉर्ड बनाया था।

उत्तर प्रदेश की हर लोकसभा सीट में पांच विधानसभा प्रखंड आते हैं। यानी बीजेपी औरसहयोगियों के पास अगर ७३ लोकसभा सीटें हैं तो अगर इस अनुपात में उन्हें ४०२ में से३६५ सीटें जीतनी चाहिए।

लेकिन एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक काआकलन है कि अगर आज चुनाव हो जाए तो भाजपा यूपी में उतनी भी विधानसभा सींटें जीत लेजितनी २०१४ में लोकसभा सीटें जीती थीं तो ही बहुत होगा। हालांकि २००९ में यहस्थिति यूपी में कांग्रेस की थी।

२००७ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस राज्य की४०२ में से केवल २२ सीटें जीत पाई थी। लेकिन दो साल बाद हुए लोकसभा चुनाव मेंकांग्रेस ने २२ सींटें जीत कर सभी को चकित कर दिया था।

इसीलिए दोनों अपनी पार्टी और अपनेगठबंधन को मज़बूत बनाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस अपने बिहार केमहागठबंधन को यूपी में लाकर और विस्तार देना चाहती है।

राष्ट्रीय जनता दल और जनतादल (यू) के अलावा वह और क्षेत्रीय दलों को जोड़ कर एक मज़बूत विकल्प बनने की कोशिशकर रही है। इसी क्रम में उसने मोदी और नीतीश कुमार के चाणक्य कहलाने वाले प्रशांतकिशोर से रणनीति बनाने को कहा है।

यूपी में कांग्रेस ने आखिरी बार सरकार१९८४ में बनाई थी। उसके बाद से ही वह कभी सपा तो कभी बसपा के साथ गठबंधन करती रहीहै।

नतीजा यह हुआ कि कभी ४०-४२ फ़ीसदी वोट पाने वाली पार्टी केवल ८-९ फ़ीसदी वोटबैंक तक सिमट कर रह गई।

२००९ के लोकसभा चुनाव में उसकी अप्रत्याशित सफलता का कारणन्यूक्लिअर डील नहीं थी। बल्कि तत्कालीन सत्तारूढ सपा का बीजेपी के विद्रोही नेताकल्याण सिंह से हाथ मिलाना था।

“बाबरी विध्वंस” के आरोपी कल्याण सिंह के”मौलाना मुलायम” के साथ आने से अल्पसंख्यक बड़ी संख्या में कांग्रेस कीओर चले गए थे।

कांग्रेस का मानना है कि उसके ८-९फ़ीसदी वोटों के साथ अजित सिंह के ४-५ फ़ीसदी जाट वोट, नीतीश कुमार- के ४फ़ीसदी पिछड़े कुर्मी और लालू प्रसाद यादव की वजह ३-४ फ़ीसदी कोरी, कुशवाहा जैसी अतिपिछड़ी जातियों के मिलने से कुल वोट २०-२१ फ़ीसदी हो जाता है।

यदि इसमें राज्य की१७ फ़ीसद अल्पसंख्यक आबादी का चौथाई हिस्सा मिल जाए तो जीत के करीब पहुंचने की संभावनाबनती है।

कांग्रेस के सूत्रों के अनुसार यदिप्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में प्रचार अभियान की कमान अपने हाथ में ले लें तोयुवाओं का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस के पक्ष में वोट कर सकता है।

यदि वे चुनाव सेपहले ही तीन सौ प्रचार सभाएं संबोधित करें तो उत्तर प्रदेश में चुनाव कांग्रेसगठबंधन बनाम अन्य बन सकता है।

वे न तो मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हों न ही किसीअन्य पद की दावेदार। धीरे-धीरे प्रियंका लाओ देश बचाओ के नारे को कांग्रेसी अपनासमूह गान बनाने लगे हैं. जगह-जगह धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं।

वहीं, अजित सिंह को बीजेपी ने २५ सीटें लड़नेके अलावा उन्हें खुद को राज्यसभा सीट देने का प्रस्ताव दिया है। यही प्रस्तावउन्हें सपा से भी मिला थी।

अजित राजी भी हो गए थे लेकिन ४८ घंटों के अंदर ही यहगठबंधन टूट गया। अब संभव है कि वे बीजेपी के प्रस्ताव को उसी की शर्तों पर मानजाएँ।

बीजेपी किसी भी शर्त पर जाटों का वोट अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहती।लेकिन बीजेपी के पास एक लोकप्रिय चेहरे का अभाव है। इसीलिए माना जा रहा है कि वहस्मृति ईरानी पर दाँव लगा सकती है।

‘सास भी कभी बहू थी’ दैनिक टीवी सीरियल सेकेंद्रीय मंत्री बनने की सफ़र महज दस सालों में तय कर चुकी स्मृति ईरानी ने पिछलेदिनों यूपी मे अपनी सक्रियता बहुता बढ़ा दी है।

पिछले सप्ताह वे गोरखपुर मेंकार्यकर्ता सम्मेलन संबोधित करने गईं थी. उससे पहले वाराणसी गई थीं। माना जा रहाहै ‘जातिहीन’ स्मृति ईरानी यूपी की जातिगत राजनीति में ऐसा मोहरा होंगी कि विपक्षीउसकी काट ढूंडते रह जाएंगे।

उत्तर प्रदेश की उनकी दावेदारी में केवलएक संदेह जताया जा रहा है – क्या उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन औरसहयोग मिलेगा? और क्या उन्नाव बाहरी होने की ठप्पा चिपक तो नहीं जाएगा, वैसे ही जैसे दिल्लीमें किरण बेदी पर लगा था।

संघ के संगठन मंत्री संदीप बंसल और ओम माथुर फिलहालउत्तर प्रदेश चुनाव के लिए बीजेपी के प्रभारी हैं। अगर ईरानी को मुख्यमंत्री पद केउम्मीदवार के बजाए बतौर प्रचार प्रमुख पेश किया जाता है तो वह रणनीति के तहत होगा, संघ के दबाव मेंनहीं।

वहीं दूसरा चेहरा राजनाथ सिंह हैं। कुशलप्रशासक की छवि के साथ पूरे राज्य में वरिष्ठता और लोकप्रियता के पैमाने पर उनकीस्वीकार्यता बहुत ज्यादा है।

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जबकि योगी आदित्यनाथ अपनी हिंदू युवा वाहिनी की ताक़तके बल पर मुख्यमंत्री पद की दावेदारी जता रहे हैं तो वरुण गांधी युवा नेता की छविभुनाने के चक्कर में हैं।

यह भी संभव है कि पार्टी किसी एक चेहरे के बजाए संयुक्तनेतृत्व प्रोजेक्ट कर चुनावी समर में उतरे। वहीं सपा को अखिलेश के कुशल प्रशासन, युवा नेतृत्व औरविकासशील नेता की छवि का भरोसा है तो जनता के सामने सपा कार्यकर्ताओं कीगुंडागर्दी का भी उदाहरण है।

वहीं मायावती को एंटी-इनकमबेंसी और बेहतर कानूनव्यवस्था का प्रशासन देने का भरोसा है। बसपा ने अपने सभी ४०३ उम्मीदवारों के नामछह महीने पहले ही घोषित कर दिए थे।

आज जब दूसरी पार्टियां चुनाव की तैयारियों औरगठबंधन के बारे में सोच रही हैं तो वहीं बसपा उम्मीदवार अभी से पूरे जोरशोर सेप्रचार में जुटे हैं।

शरद गुप्ता

शरद गुप्ता इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक  भास्कर  और अन्य कई महत्वपूर्णपत्र पत्रिकाओ के साथ जुड़े रहे है।

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