ओडिशा उप-चुनाव में बीजेपी को भारी शिकस्त क्यों?




बीजेडी उम्मीदवार और बीजेपुर के पूर्व विधायक सुबल साहू की पत्नी रिता साहू


राजेश राज

ओडिशा के बीजेपुर विधानसभा सीट के लिए हुए मध्यावधि चुनाव में सत्तारुढ बीजू जनता दल(बीजेडी) ने भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) को करारी शिकस्त देते हुए जीत दर्ज कर ली है।

बीजेडी उम्मीदवार और बीजेपुर के पूर्व विधायक सुबल साहू की पत्नी रिता साहू ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी बीजेपी उम्मीदवार अशोक पाणिग्रही को 41,933 वोट के भारी अंतर से पराजित कर दिया।

बीजेपुर विधानसभा सीट कांग्रेस पार्टी के लिए पिछले 15 सालों से अभेद्य किले की तरह साबित होती रही। लेकिन उसी सीट पर कांग्रेस पार्टी का उम्मीदवार प्रणय साहू अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। 1,81,716 वोट में से केवल 10,274 वोट ही पा सके।

बीजेडी की इस जीत ने मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की विश्वसनीयता और बढ़ा दी है, वहीं बीजेपी के ओडिशा में सत्ता में आने के सपने को भी एक तरह से चूर-चूर कर दिया है। एक साल पहले यहीं हुए पंचायत चुनाव में बीजेपी 90 हजार वोट पाने में सफल रही थी।

सवाल यह है कि बीजेपी के लिए ये हार बीजेडी की जीत है या फिर पिछले 15वर्षों से सुबल साहू पर क्षेत्र के लोगों का दिखाया जाने वाला असीम विश्वास।

राजनीतिक विश्लेषक इस बीजेडी की इस जीत को दोनों नजरिए से तौल रहे हैं। कुछ लोगों को मानना है कि बीजेपुर की चुनावी सभा में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक पर एक ब्यक्ति ने जूता उछाला ।

उसके बाद, बीजेडी के एक मंत्री के भाई और उसके साथियों पर हमले में भी बीजेपी का नाम आया था। इस हमले में एक बीजेडी कार्यकर्ता की मौत भी हो गई थी। बीजेडी ने इसे भाजपा समर्थित हिंसा करार दिया था और कहा था कि चुनाव में क्षेत्र की जनता इसका मुंहतोड़ जवाब देगी।

तो क्या, बीजेपी को मिली करारी शिकस्त हिंसा की राजनीति को दिया गया मुंहतोड़ जवाब है?

चुनावी परिणाम सामने आने के तुरंत बाद मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने विशाल जीत लिए बीजेपुर की जनता को धन्यवाद दिया और कहा कि ओड़िशा एक शांतिप्रिय राज्य है। यहां के लोग उस हिंसा के साथ नहीं खड़े होंगे जो लोकतंत्र के लिए खतरा हो।

बीजेडी के वरिष्ठ नेता प्रसन्ना आचार्या ने भी कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा- “इतने विशाल अंतर के साथ जीत मिलने की हमने तो कल्पना भी नहीं की थी। यह बुराई पर अच्छाई की जीत है। बीजेपुर की जनता ने उस दल को माकूल जवाब दिया है जिसने मुख्यमंत्री नवीन पटनायक पर हमला किया।”

तो क्या सच है कि भाजपा क्षेत्र की जनता का नब्ज पहचाने में नाकाम रही और उसके अपनाए हथकंडे उसी पर भारी पड़े? या फिर यह जीत ना बीजेडी की जीत है, ना बीजेपी की हार, बल्कि यह जीत एक व्यक्ति विशेष पर क्षेत्र की जनता का अगाध विश्वास है।

2003 से यह सीट कांग्रेस पार्टी, या फिर यूं कहें कि सुबल साहू के नाम रही है। 2004, 2009 और 2014 में यहां से सुबल साहू लगातार जीत दर्ज करते रहे थे। यहां तक कि बीजेडी के कद्दावर नेता प्रसन्ना आचार्य को भी वो शिकस्त दे चुके थे।

उनके निधन के बाद मध्यावधि चुनाव में जनता ने उनकी पत्नी रीता साहू को भारी मतों से विजयी बनाया है।

सत्ता में रहने के बावजूद 15 सालों से इस सीट पर जीत दर्ज ना कर पाना बीजू जनता दल और उससे भी ज्यादा मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया था।

यह सीट मानो उनके विजय अभियान की लगाम थाम लेने वाली सीट बन गई थी। अगले साल के आम चुनाव से पहले यह चुनाव नवीन पटनायक के लिए निसंदेह नाक का सवाल बनकर सामने आया।

तीन-तीन चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक देने के बाद भी इस सीट से जीत दर्ज ना कर पाने का सबक बीजेडी पार्टी और सुप्रीमो के सामने था ही।

लिहाजा, इस बार दांव उसी परिवार पर लगाया गया जिस पर क्षेत्र की जनता बेहद भरोसा करती आई थी। उप चुनाव की घोषणा होते ही बीजेडी ने दिवंगत विधायक सुबल साहू की पत्नी रीता साहू को अपनी पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर दिया।

सहानुभूति की लहर और नवीन पटनायक सरकार की विकास वाली छवि ने मिलकर गहरा असर डाला। पार्टी को सोच से भी ज्यादा अंतर से जीत हासिल हुई।

सवाल है, भाजपा से चूक कहां हुई? अगर हर रणनीति का आंकलन जीत और हार से होती है, तो निसंदेह भाजपा के रणनीतिकारों से चूक हुई है।

इस हार का ठीकरा भी केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के सिर फूटेगा। चुनाव का सारा कमान वही संभाल रखे थे। पैसा, ग्लैमर, ताकत से लेकर राजनीतिक हथकंडे का हर दांव आजमाया गया। इसके बाद भी हाथ हार लगती है तो सवाल उठेंगे ही।

तो क्या हिंसा का रास्ता और आक्रामक रवैया बीजेपी को ले डूबी? इसका कोई एक जवाब सारे प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकता। लेकिन, हार के बाद लोग पूछ तो यही रही हैं।