भद्रता की भाषा नहीं समझेगा पाकिस्तान!




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अनिल विभाकर

भद्रता की भाषा नहीं समझता पाकिस्तान। देश में सांप्रदायिक सद्भाव और कश्मीर में शांति चाहिए तो पाकिस्तान के साथ सख्ती से पेश आना होगा।

लगता है आजादी के बाद अब भारत सरकार को यह हकीकत समझ में आ गई। इसलिए कश्मीर मुद्दे पर केंद्र ने पहली बार आक्रामक रणनीति अपनाते हुए गेंद पाकिस्तान के पाले में डाली है।

यह गेंद इतनी दमदार और घातक है कि पाकिस्तान के लिए यह परमाणु बम साबित हो सकती है। भारत को यह आक्रामक कूटनीति बहुत पहले अपनानी चाहिए थी।

ऐसा होता तो पाकिस्तान अब तक भारत के लिए एक अच्छा पड़ोसी बन गया होता। और तब कश्मीर में न तो रह-रह कर इस तरह उपद्रव होते और न ही घाटी में पाकिस्तानी झंडे फहराए जाते।

ऐसा होता तो कश्मीर के लाल चौक पर भी दिल्ली के लाल किले की तरह ही तिरंगा फहरता। ऐसा क्यों नहीं हुआ इसके कारणों की पड़ताल बहुत जरूरी है।

दरअसल भारत सरकार ने हमेशा भद्रता दिखाते हुए पाकिस्तान को हर बार सुधरने का मौका दिया मगर वह तो सुधरने को तैयार है ही नहीं । उसने भारत की इस भद्रता को हमेशा गलत अर्थ में लिया।

युद्ध में बार-बार पराजित होने के बाद भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया।

इसी साल पाठानकोट हमले के बाद भारत सरकार ने आपसी समझ के तहत पाकिस्तानी जांच दल को यहां आकर घटनास्थल का मुआयना करने की इजाजत दी मगर उसने इस मामले में भी दगा देते हुए भारतीय जांच दल को पाकिस्तान जाने की अनुमति नहीं दी।

भारत में बार-बार पाकिस्तानी आतंकवादी पकड़े जा रहे हैं फिर भी वह यह मानने को तैयार नहीं कि यहां हो रही आतंकवादी घटनाओं में उसका हाथ है।

हकीकत यह है कि पाकिस्तान बेशर्मी और ढिठाई की सारी हदें पार कर चुका है। और अब उसके साथ राजनयिक संबंध बनाए रखने का भी कोई औचित्य नहीं रह गया है।

जम्मू -कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है इससे इनकार कौन कर सकता है? इससे इनकार सिर्फ पाकिस्तान करता है और भारत में सक्रिय उसके कुछ समर्थक। इन समर्थकों में कुछ राजनीतिज्ञ हैं और कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी।

राजनीतिज्ञों में भी मणिशंकर अय्यर और दिग्विजय सिंह जैसे कुछ ही वैसे हैं जो खुलेआम पाकिस्तान का पक्ष लेते हैं।

इस बार स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले से जब बलूचिस्तान , गिलगिट बाल्टिस्तान और पाक कब्जे वाले कश्मीर में हो रहे सरकारी दमन तथा मनवाधिकार हनन की चर्चा की तो कांग्रेस समेत भारत के लगभग सभी दल इस पर सरकार के समर्थन में उतरे ।

पूर्ब विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद को यह बिल्कुल ही रास नहीं आया। वह बुरी तरह तिलमिला उठे और उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अभद्र तक कह डाला।

इसके बाद कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने पिछले कुछ दिनों से कश्मीर घाटी में जारी हिंसा और अशांति के लिए पाकिस्तान की जगह न सिर्फ केंद्र और राज्य सरकार को दोषी ठहराया बल्कि कश्मीर के इस हिस्से को आईओके तक कह डाला।

आईओके यानी भारतीय कब्जे वाला कश्मीर। पाकिस्तान भी यही कहता है। समझ में नहीं आता कांग्रेसियों को हो क्या गया है? छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हमेशा मुस्लिम वोट की राजनीति करने के लिए बदनाम ये कांग्रेसी कब सुधरेंगे?

ये वही दिग्विजय सिंह हैं जिन्हें मुंबई के आतंकी हमले में पाकिस्तान का हाथ नहीं नजर आया था। उन्होंने बिना समय गंवाए इसके लिए आरएसएस को जिम्मेदार ठहराया था।

उस समय घटनास्थल पर यदि पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब जिंदा नहीं पकड़ा गया होता तो हो सकता था कि तत्कालीन केंद्र सरकार इसमें भी पी चिदंबरम की भगवा आतंकवाद की थ्योरी पर चलते हुए कुछ हिंदू साधु-संन्यासियों को जेल में डाल कर पाकिस्तान को
क्लीन चिट दे देती।

याद रहे दिग्विजय सिंह ओसामा बिन लादेन और हाफिज सईद को आदर-सम्मान देने में तनिक भी नहीं हिचके । वे बेहिचक ओसामा जी और हाफिज जी कहते हैं।

वे बाटला हाउस मुठभेड़ को भी अपने बयानों से विवादित बनाने से नहीं चूके जबकि उनकी पार्टी की सरकार ने बार-बार उनके इस आरोप को खारिज किया।

कांग्रेस में दिग्विजय एक ऐसे नेता हैं जो हमेशा मुस्लिम वोट बैंक बनाए रखने के लिए सांप्रदायिक तत्वों,आतंकवादियों और उग्रवादियों के पक्ष
में खड़े नजर आते हैं।

कांग्रेस में इसी तरह के बेलगाम नेता मणिशंकर अय्यर भी हैं। अय्यर केंद्र की मोदी सरकार को किसी भी कीमत पर सत्ता से बेदखल करना चाहते हैं।

इस काम में वे खुलेआम पाकिस्तान की मदद लेना चाहते हैं। कुछ महीने पहले वे जब पाकिस्तान गए थे तो उन्होंने पाकिस्तानी मीडिया से इंटरव्यू में साफ-साफ कहा था कि जब तक मोदी सरकार को आप हटाएंगे नहीं तब तक भारत और पाकिस्तान के संबंध नहीं सुधरेंगे।

अय्यर ने कहा था आप मोदी सरकार को हटाइये और हमें ले आइए। इस तरह के नेता कांग्रेस में हैं जिन्हें यदि आप देशद्रोही कहेंगे तो सारे प्रगतिशील बुद्धिजीवी आप पर टूट पड़ेंगे।

वे ऐसे लोगों को देशभक्त होने का सर्टिफिकेट देंगे और इन नेताओं की नीयत पर सवाल उठाने वालों को सांप्रदायिक बताएंगे। इस अक्षम्य अपराध को अभिव्यक्ति की आजादी का जामा पहनाकर वे इसे क्षम्य बताएंगे। कहेंगे भारत के लोकतंत्र की यही तो खासियत है।

इसी खासियत के कारण यह देश इतनी विभिन्नताआें के बावजूद अब तक एक है। जेएनयू में अफजल गुरू और मकबूल बट्ट का महिमामंडन करने के लिए कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी,भारत की बरबादी तक जंग रहेगी-जंग रहेगी के नारे लगाने वालों के पक्ष में कांग्रेस हाईकमान और वामपंथी नेता किस तरह आगे आए यह किसी से छिपा नहीं है।

कहने का अर्थ यह कि जब देश के अंदर ही कुछ एनजीओ,वामपंथी बुद्धिजीवी,कांग्रेस और वाम दलों के कुछ नेता आतंकवादियों और अलगाववादियों का इस तरह खुलेआम पक्ष लेते हैं तो पाकिस्तान अपनी भारत विरोधी हरकतों से बाज कैसे आएगा।

यह उम्मीद करना ही गलत है। ऐसे ही लोगों के कारण पाकिस्तान का हौसला पस्त नहीं हो रहा।

विदेशी पैसे से चलने वाले एनजीओ और वामपंथी बुद्धिजीवियों को पाक कब्जे वाले कश्मीर,गिलगिट बाल्टिस्तान और बलूचिस्तान में आम लोगों पर पाकिस्तानी फौज और पुलिस का अत्याचार और उनका मानवाधिकार हनन नहीं नजर आता मगर घाटी में सक्रिय पाकिस्तानी घुसपैठियों , आतंकवादियों और अलगाववादियों की ढाल बनने में वे बेशर्मी की कोई भी सीमा लांघते रहते हैं।

ऐसे ही लोग छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासियों पर जुल्म ढा रहे माओवादियों के समर्थन में हमेशा खड़े रहते हैं और वहां सुरक्षा बालें के मारे
जाने पर जश्न भी मनाते हैं।

अलगाववादी और आतंकवादी कश्मीर में जिस तरीके से उत्पात मचा रहे हैं वही तरीका बस्तर के जंगलों में माओवादी भी अपनाते हैं। अलगाववादियों और आतंकवादियों ने वहां के आम लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है।

बस्तर के जंगलों में माओवादी आदिवासियों के हर घर से एक बच्चा या एक व्यक्ति को जबरन अपने साथ ले जाते हैं। मना करने पर वे उस परिवार पर बेइंतहा जुल्म ढाते हैं।

इसी तरह कश्मीर में भी अलगाववादी आधी रात में हर घर का दरवाजा ठोक कर लोगों को नारे लगाने के लिए बुलाते हैं। कोई यदि पत्थर फेंकने से रोकता हैं तो उसे थप्पड़ मारते हैं।

पत्थरबाजों ने घाटी में एक नियम बना रखा है। इस नियम के अनुसार भारत विरोधी प्रदर्शन में भीड़ बढ़ाने के लिए हर घर से एक व्यक्ति को
जाना जरूरी है।

अलगाववादी रोज घर जाकर लोगों को धमकाते हैं। कहते हैं प्रदर्शन में चलो नहीं तो भुगतने को तैयार रहो। बस्तर के जंगलों में यही रणनीति माओवादी वर्षों से अपना रहे हैं।

हकीकत यह है कि माओवादियों और अलगाववादियों के बीच गहरे संबंध हैं। और माओवादी भी कश्मीर में अलगाववादियों के साथ हिंसा और प्रदर्शन में सक्रिय हैं।

लगभग पांच साल पहले छत्तीसगढ़ पुलिस के हाथ माओवादियों के पास से एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हाथ लगा था जिसमें यह साफ लिखा था कि कश्मीर में उपद्रव और अशांति बढ़ाना जरूरी है।

इसके पीछे तर्क यह था कि कश्मीर शांत रहेगा तो वहां से अर्द्धसैनिक बलों को हटाकर बस्तर और अन्य माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में तैनात कर दिया जाएगा।

माओवादियों और अलगाववादियों के बीच गहरे रिश्ते हैं इसीलिए जेएनयू, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय और जाधवपुर विश्वविद्यालय जहां वामपंथियों का वर्षों से जमावड़ा रहा है,वहां कश्मीर की आजादी के नारे लगाए जाते हैं।

वहां सेमिनार और अन्य तरह के आयोजन कर आतंकवादी अफजल गुरु की फांसी को न्यायिक हत्या करार दिया जाता है और बेखौफ होकर नारे लगाये जाते हैं -अफजल हम शर्मिंदा हैं,तेरे कातिल जिंदा हैं।

ऐसे ही माओवादियों ने आतंकवादी मकबूल भट्ट को फांसी से बचाने के लिए आधी रात में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इतिहास में पहली बार इस मामले की सुनवाई के लिए सर्वोच्च अदालत आधी रात से लेकर सुबह तक बैठी थी।

माओवादियों ने एक कश्मीरी आतंकवादी को बचाने के लिए ऐसा किया था। बावजूद इसके वे उसे फांसी पर लटकाए जाने से बचा नहीं पाए थे। माओवादियों की धर्म में कोई आस्था नहीं है मगर वे इस्लाम और ईसाई धर्म के प्रति हमेशा हमदर्द रहे हैं।

माओवादी और वामपंथी हमेशा हिंदू धर्म के विरुद्ध नजर आते हैं। हिंदू धर्म में उन्हें हर तरह की बुराइयां नजर आती हैं और इस्लाम की हर कट्टरता उन्हें उदारता से भरी लगती है।

हाफिज सईद और बुरहान वानी को वे आतंकी नहीं मानते। दरअसल अलगाववादी और माओवादी दोनों मिलकर देश में अराजकता पैदा करने में लगे हैं। इसमें उन्हें विदेशी धन से चल रहे एनजीओ,मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, कुछ मीडियाकर्मियों और कथित दलित चिंतकों का भरपूर साथ मिल रहा है।

लाल सलाम का नारा लगाने वाले अब नील सलाम का नारा लगा रहे हैं मगर काम वे वही कर रहे हैं जो पहले करते रहे हैं।  अब जब नरेंद्र मोदी सरकार ने पाक कब्जे वाले कश्मीर समेत बलूचिस्तान, गिलगिट बाल्टिस्तान के मुद्दे पर गेद पाकिस्तान के पाले में डाली है तो पाक के साथ भारत में सक्रिय उसके हमदर्द भी बेचैन हो उठे।

उनकी यह बेचैनी स्वाभाविक है। यह गेंद इतनी घातक है कि पाकिस्तान के लिए यह परमाणु बम साबित हो सकती है। यही वजह है कि कुछ
पाक परस्त राजनेता अब घाटी की समस्या का राजनीतिक हल निकालने की दलील दे रहे हैं।

देश के बंटवारे के बाद से जम्मू कश्मीर में लंबे समय तक शेख अब्दुल्ला, उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला के बेटे उमर अब्दुल्ला का शासन रहा।

इस बीच कुछ समय के लिए वहां कांग्रेस की भी सरकार रही मगर वहां की समस्या सुलझने की बजाय और उलझती गई। ऐसा इन दलों की सांप्रदायिक और तुष्टिकरण की नीतियों की वजह से हुआ।

ऐसी ही गलत और सांप्रदायिक नीतियों के कारण घाटी में कश्मीरी पंडितों की हत्याएं हुर्इं और उन्हें वहां से भागने को मजबूर होना पड़ा। ताज्जुब है कि कश्मीरी पंडितों का दर्द किथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं और मानवाधिकारवादियों को कभी नहीं महसूस होता।

वहां की जनता ने जब कांग्रेस और उमर अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस को इस बार सत्ता से बेदखल कर दिया तो पाकिस्तान और यहां की कुछ पार्टियां बेचैन हो उठीं।

मुठभेड़ में आतंकी बुरहान वानी के ढेर होने से अलगाववादी और पाकिस्तान बुरी तरह बौखला उठे। पिछले डेढ़ महने से घाटी में अशांति है। सुरक्षाबल उपद्रवियों और अलगाववादियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं जिसपर विपक्षी दलों के कुछ नेताओं को एतराज है।

उमर अब्दुल्ला ने एक प्रतिनिधिमंडल के साथ नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और कहा कि इस समस्या का हल विकास से नहीं राजनीतिक रूप से किया जाना चाहिए। कांग्रेस समेत कुछ अन्य विपक्षी नेताओं की भी यही राय है।

सवाल है इसका क्या राजनीतिक हल हो सकता है? अलगाववादी और आतंकवादी कश्मीर को भारत से अलग करना चाहते हैं। तो क्या कश्मीर को भारत से अलग कर अलगाववादियों की मांग मान लेनी चाहिए?

राजनीतिक हल से विपक्ष और उमर अब्दुल्ला का अभिप्राय यही है क्या? दरअसल इस तरह की बात से पाकिस्तान और अलगाववादियों के हौसले बुलंद होते हैं।

पैलेट गन से अलगाववादियों को परेशानी हो रही है तो कुछ नेता घाटी में इसका विरोध कर रहे हैं। पैलेट गन का इस्तेमाल बंद कर उपद्रवकारियों और हथगोले चलाने वालों पर राइफलें चलाई जाएंगी तो मौतें ज्यादा होंगी।

पैलेट गन की गोलियों से लोग सिर्फ घायल होते हैं।  अलगाववादी चाहते हैं कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई में अधिक से अधिक लोग मारे जाएं। इससे घाटी में अशांति भी बढ़ेगी और उनके प्रति लोगों का समर्थन भी बढ़ेगा।

आतंकवादी और अलगाववादी यही चाहते हैं और विपक्ष के कुछ लोग भी बिना सोचे -समझे यही चाहते हैं। ऐसा राजनीतिक व्यवहार देशहित में कतई नहीं।

यह अच्छी बात है कि इस बार केंद्र ने सख्ती दिखाई है और हालात से निपटने के लिए वहां बीएसएफ की तैनाती शुरू कर दी है। बिना सख्ती के न तो पाकिस्तान सुधरेगा और न अलगाववादी।

 

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लेखक हिंदी के वरिष्ठ कवि और वरिष्ठ पत्रकार हैं।राष्ट्रीय हिंदी दैनिक जनसत्ता के रायपुर संस्करण और हिंदी दैनिक नवभाारत के भुबनेश्वर संस्करण के संपादक रह चुके हैं । इसके अलाबा हिंदुस्तान के पटना संस्करण में दो दशक तक वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं । इस लेख में दिए गए बिचार उनके निजस्व हैं ।