मोदी का शासन पर पकड़ कमजोर, या गलतियों का बोझ

 

शासन हनक से चलता है। गिरगिराकर या मुंह छुपाकर नहीं। यह बात नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2014 में सत्ता संभालते ही सबको बता दिया था। फिर चार साल उसी दबंगई से वह भारत की सत्ता व्यवस्था संभालते आ रहे हैं।

पर क्या इस अंतिम पांचवे वर्ष में यही बात कह सकते हैं। सभंवततः नहीं। लगता है मोदी सरकार अपनी चमक खो रही है। राजनीतिक रूप से भी और शासन अनुशासन में भी। कोई एक दो उदाहरण नहीं है, बल्कि लगातार ऐसा महसूस हो रहा है कि मोदी सरकार किसी कुकुन में घुसती जा रही है।

 

जहां वह कई मुद्दों पर साफगोई दिखाने से बच रही है। विपक्ष का प्रहार का प्रत्युत्तर देने के बजाय कुछ थोथे तर्कों से उनकों सिर्फ कुंद करने में लगी है। मोदी सरकार की इस बचाव की मुद्रा से मुझ जैसे कई भाजपा के समर्थक विचलित हैं।

इस समय भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अपनी सरकार बचाना नहीं है, बल्कि उससे भी बड़ी चुनौती राजनीतिक रसूख बचाये रखने की है, जिसे मोदी और अमित शाह की संयुक्त जोड़ी ने पिछले कुछ वर्षों में बनाया है।

भाजपा का रसूख केवल एक जगह दाव पर नहीं है। चुनावी फ्रंट पर जीत हार कोई बड़ी बात नहीं है। रसूख दाव पर राफेल के कारण है, एससीएसटी एक्ट पर भाजपा के भीतर की उठ रहे कई स्वरों को लेकर है, कश्मीर और पाकिस्तान के साथ सबंधों को लेकर है, देश मे रोजगार की समस्या और बेरोजगारी के आकड़ों को लेकर है। विजय माल्या के प्रति सरकार के रवैये को लेकर है।
जब हम देश बदलने निकले हैं, तो राजनीतिक नफे नुकसान का अंदाजा हर कदम पर नहीं कर सकते। यदि एससीएसटी एक्ट में वो प्रावधान जरूरी ही थे जिसके लिए हमने संसद से आनन फानन में बिल पास करवाया तो फिर उसे लेकर पार्टी मेदो दो आवाजं क्यों।

एससीएसटी के खिलाफ किसी भी तरह के अपराध की एफआईआर दर्ज होते ही यदि गिरफ्तारी जरूरी ही है तो यह बात पार्टी के नेताओं को समझ में आनी चाहिए या फिर नेतृत्व को उन्हें समझाना चाहिए, लेकिन अजीब बात यह है कि संसद से कानून बनने के बाद भी भाजपा के ही बड़े नेता इसका अपने अनुसार पालन कराने के बात कर रहे हैं।

यह दोतरफा मरहम लगाने से भाजपा को ज्यादा राजनीतिक पीड़ा होगी। अपराध साबित हुए बिना सजा का प्रावधान वेसे है तो अनैसगिक ही, लेकिन यदि सरकार इसे उचित मानती ही है तो फिर इसका विरोध क्यों?

न खाउंगा और न खाने दूंगा। सामान्य भाजपा कार्यकत्र्ताओं के लिए कोई जुमला नहीं था, बल्कि अन्य भारतीयों की तरह भाजपा के लोगों के लिए भी एक गर्व की अनुभूति थी। हमने भी सीना ठोक कर कहा कि एक भी सबूत दीजिए जिससे यह साबित हो कि मोदी सरकार कहीं से भी भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार है।

और अभी तक कोई सबूत आया भी नहीं। लेकिन तथ्य के साथ जो घटनाएं सामने आई हैं, वे हमारी डिफेंस को भेद देती है, फिर भाजपा ओर मोदी सरकार के बचाव के लिए गलथोथी करनी पड़ती है।

उदाहरण के लिए जब विजय माल्या ने कहा कि वह भारत छोड़ने से पहले वित मंत्री अरूण जेटली से मिला था और उसी बात की तस्दीक जब खुद अरूण जेटली करते हैं तो फिर बचाव में यह कहना कि चलते चलते मिले, पीछे से मिले हमने कोई बात नहीं की और ना ही कोई प्र्रस्ताव सुना या माना, थोड़ा बचकाना लगता है।

हम इस बात को पहले भी दमदारी से कह सकते थे कि माल्या अपने बचाव के लिए अरूण जेटली के पास आया लेकिन उन्होंने उसे बुरी तरह झिड़क दिया। यदि हम पहले यह कह देते तो सफाई देने की जरूरत ही नहीं पड़ती। लेकिन हमने बाद में सफाई दी ओर यह माना भी कि माल्या सदन में मिले।

उसके बाद इस तर्क का क्या मतलब रह जाता है कि माल्या की सांठगांठ कांग्रेस से थी और कांग्रेस ने उन्हें लोन दिलाने में मदद की। यदि ऐसा था तो फिर उन कांग्रेसियों या उनके चहेते बैंक अधिकारियों के खिलाफ हमने चार साल में कोई कार्रवाई क्यों नहीं की।

इस मामले में सीबीआई का जवाब भी बड़ा कमजोर प्रतीत हुआ। माल्या के खिलाफ लुकआउट नोटिस को कमजोर करने की सीबीआई की दलील अब कौन माानेगा कि उस समय माल्या जांच में सहयोग कर रहा था इसलिए उसे विदेश जाने से रोकने की कोई वजह नहीं थी।

जब हम चिदंबरम के बेटे कार्तिक को विदेश जाने से रोकने के लिए अदालत से गुहार कर सकते हैं जो विजय माल्या को अतिरिक्त भला मानने का क्या तुक था। सीबीआई को उसकी चूक के लिए हमने कुछ किया ही नहीं।

प्रधानमंत्री मोदी खुद राफेल डील के साथ अनावश्यक विवाद में फंस गए हैं। भारत का कोई भी नागरिक इस बात को मानने को तैयार नहीं होगा कि मोदी भी किसी भ्रष्टाचार के अंग हो सकते हैं। लेकिन फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति का बयान कि आफ सेट व्यावसाय के लिए रिलायंस का नाम भारत सरकार ने ही सुझाया था, काफी विस्फोटक हो सकता है।

किसी एक निजी कंपनी को प्रमोट करने और उसे बड़ा व्यावसायिक ठेका दिलाने में प्रधानमंत्री का नाम यदि आ जाए तो फिर ईमानदारी की दुहाई कैसे दे सकते हैं। रिलायंस के व्यावसायिक हित से कहीं बड़ी जरूरत है देश ओर प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता बनाये रखना।

फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति होलांडे का यदि बयान सही है तो प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता पर चोट हुई है, जो हमे आहत करने के लिए काफी है। होलांदे के बयान से राजनीतिक तूफान आएगा ही।

विक्रम उपाध्याय

विक्रम उपाध्याय बिग वायर हिंदी के संपादक हैं