शिक्षा में भेद कैसे बनेगा नया देश

विक्रम उपाध्याय

कहते हैं जिस खेत का बीज ही अच्छा ना हो उस खेत की फसल से क्या उम्मीद. यही बात भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर लागू होती है .जब स्कूल सिस्टम शिक्षित बच्चों को काबिल बच्चे के रूप में बदलने में असफल हो ,तो उस देश की तरक्की की क्या होगी. होगी भी .

तो ऐसी ही ,जैसे आज हो रही है . कुछ लोग ही इस तर्की में भागीदारी बन रहे हैं और कुछ लोग ही इस तरक्की की मलाई खा रहे हैं . बाकी सब लोग तमाशा देख रहे हैं. कभी सिस्टम को तो कभी खुद को कोस रहे हैं .

जो आगे बढ़ गए भगवान को धन्यवाद दे रहे हैं . जो भीड़ में पीछे छूट गए वे किस्मत का लिखा मानकर संताप कर रहे हैं . पर क्या यह सब किस्मत की बात है? शिक्षित और कामयाब होना भी क्या किस्मत की बात है ?

कम से कम हमारी सरकारें तो यही बताती हैं शिक्षा के क्षेत्र में नरेंद्र मोदी की सरकार भी पिछली सरकारों की तुलना में कोई कामयाब नहीं है. 1 लाख करोड़ का बजट तो है लेकिन इस बजट से किसका भला हो रहा है सब जानते हैं .

एक तरफ टाटपट्टी, बिना दीवार, बिना दरवाजे का स्कूल है , तो दूसरी तरफ आलीशान महल एसी कमरे और बड़ी बड़ी गाड़ियों वाला स्कूल है. एक तरफ बिना क्लास रूम की 50-50 बच्चे बिठाए जा रहे हैं ,तो एक तरफ बंद कमरे में टीचर कंप्यूटर और टैब सेे पढ़ा रहे हैं .

अंग्रेजों ने बांटो और राज करो की राजनीति अपनाई थी , पर भारत सरकार भला ऐसा क्यों कर रही है ? वह दो देश क्यों बना रही है एक देश अमीरों के लिए जिसके पास सुविधाएं हैं आगे बढ़ने का अवसर है ,सत्ता में भागीदारी की उम्मीद है और उसका लाभ उठाने की लालसा एवं आकांक्षा है.

दूसरी तरफ बेचारगी है ,गरीबी का अभिशाप है ,टाट पट्टी का स्कूल है ,भगवान का भरोसा है और शिक्षा महज औपचारिकता के लिए है . यदि ऐसा नहीं होता तो आज भी दुनिया के एक तिहाई लोग हमारे यहां निरक्षर नहीं होते . जो साक्षर हैं उनमें भी 90 फीसदी बेरोजगारी और लाचारी की लाइन में खड़े हैं .

कहने को देश की 70% जनसंख्या सरकारी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करती है .केवल 30 फ़ीसदी ही निजी स्कूलों का खर्च उठा पाते हैं . इस 30% बच्चों में से भी 3% बच्चे ऐसे हैं जिन्हें सबसे उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त होती है .

ये बच्चे भाग्यवान हैं जो किसी अमीर बाप के यहां पैदा हुए हैं, उनके नाते -रिश्तेदार अच्छे पदों पर विराजमान हैं .कहने की आवश्यकता नहीं है इन 3 प्रतिशत बच्चों को 97 फ़ीसदी बच्चों से अधिक अवसर मिलता है .
जिस देश की नींव इतनी कमजोर हो उस देश की तरक्की के सपने बुनने कितने व्यावहारिक हैं?

कहने को देश में शिक्षा ,मूल अधिकार के तहत आता है शिक्षा के अधिकार के तहत 6 साल से 14 साल के सभी बच्चों को शिक्षा प्राप्त करना कानूनी अधिकार है. लेकिन क्या हम इन कानूनी प्रावधानों का मजाक नहीं उड़ा रहे . स्कूल के नाम पर हम बच्चों को बेहद लचर व्यवस्था नहीं धकेल रहे हैं .

हाल ही में एक निजी संस्था ने सर्वे में पाया कि 50 फीसदी से अधिक सरकारी स्कूलों में ना तो टॉयलेट है ना खेलने के लिए मैदान. ना समय प्रशिक्षित शिक्षक आते हैं और ना समय सारणी के हिसाब से स्कूल चलता है. एक अनुमान के अनुसार सरकारी स्कूलों में काम करने वाले शिक्षकों में से 25 फीसदी शिक्षक रोज गायब रहते हैं .

ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों में छात्र और शिक्षक का प्रतिशत 50 छात्र पर एक शिक्षक है .

शिक्षा के नाम पर सरकारी लूट बखूबी हो रही है. रोज नए नए घोटाले उजागर हो रहे हैं. कहीं मिड डे मिल के नाम पर घोटाला तो कहीं बैग और जूते देने के नाम पर घोटाला . कहीं शिक्षक भर्ती में घोटाला तो कहीं पैसे लेकर पास कराने का घोटाला .शिक्षा भारत सरकार की प्राथमिकता में सबसे नीचे है

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के प्रमुख 126 देशों में शिक्षा की जो लचर व्यवस्था है उसमे भारत 106 नंबर पर आता है . हम से सिर्फ 20 देश ही ऐसे हैं जो शिक्षा की गुणवत्ता में हम से नीचे हैं .अब ऐसी स्थिति में कोई सरकार यह कहे कि आने वाला भविष्य भारत का है ,भारत दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है , तो यह मजाक सा लगता है .

जब 21वीं सदी की शुरुआत हुई थी ,मुझे याद है विजन 20-20 का एक प्रेजेंटेशन दिया था तब कहां गया था 2020 तक भारत एक सुपर पावर बन जाएगा. यूरोप की आधी जनसंख्या बूढ़ी हो जाएगी .

भारत का मानव संसाधन युवा लोगों के हाथ में होगा .हम पूरी दुनिया पर राज करेंगे .पर आज क्या हो रहा है अमेरिका वीजा देने में आनाकानी कर रहा है. यूरोप से भारतीयों को निकल जाने का आदेश दिया जा रहा है .

ऐसे में हमारी युवा पीढ़ी के सामने क्या विकल्प है .खुद को सक्षम बनाना, हर परिस्थितियों से जूझने के लिए तैयार रहना. लेकिन सिर्फ जज्बात से काम नहीं चलता .दुनिया को जीतना है तो हम ज्ञान के जरिए जीत सकते हैं .

 

लेकिन ज्ञान का पहला पाठ स्कूल से मिलता है .पर जिस तरह की स्कूल की व्यवस्था फिलहाल चलाई जा रही है, हम इस व्यवस्था में बस साक्षर हो सकते हैं ,योग्य नहीं.

दो भारत बनाने की यह कवायद रूकनी चाहिए. देश में समान शिक्षा व्यवस्था लागू होनी चाहिए .अमीरों के लिए अलग ,गरीबों के लिए अलग शिक्षा की व्यवस्था बंद होनी चाहिए .निजी संस्थानों को उच्च शिक्षा में ही प्रवेश की अनुमति मिलनी चाहिए. प्राथमिक ,माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पूरी तरह से सरकार के अधीन होना चाहिए .एक व्यवस्था एक और एक सुविधा.

सब के लिए एक समान अवसर होना चाहिए. नई शिक्षा नीति की घोषणा कभी भी हो सकती है उम्मीद है नये भारत के निर्माण में मोदी इस बात का विचार जरूर करेंगे कि गरीब का बेटा अमीर के बेटे साथ बैठ कर पढ़ सकता है जो अवसर अमीरों के लिए आरक्षित सा है ,गरीबों को उपलब्ध हो सकता है .

ऐसा होता है तभी नये भारत का निर्माण होगा. सबकी भागीदारी होगी सब को समान अवसर मिलेगा .देश को बराबर लाभ मिलेगा.

 

 

विक्रम उपाध्याय बिग वायर हिंदी के संपादक हैं