2019 में मोदी को कौन वोट देगा ,कौन नहीं

विक्रम उपाध्याय

चुनाव में ठीक 1 साल बचे हैं, अभी से ही भारतीय जनता पार्टी चुनाव की तैयारियों में जुट गई है .अमित शाह ने गुरुग्रामसे संपर्क अभियान शुरू कर दिया है . एक लाख प्रमुख लोगों के साथ भाजपा सीधा संपर्क साधेगी. यह वह एक लाख लोग होंगे जिनका समाज में एक रूतवा है.

जिनकी अपनी फैन फॉलोइंग है जो अपने साथ कुछ और लोगों को प्रभावित कर सकते हैं. यह अमित शाह का वोटों का अंक गणित है .हर चीज को समीकरण एवं अर्थमेटिक के नजरिए देखने वाले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह मोदी के लिए 40 फीसदी वोट हासिल करना चाहते हैं ,लेकिन सवाल यह है यह 40 फ़ीसदी वोट आएंगे कहां से . 2019 में मोदी को वोट देगा कौन ,कौन मोदी को हराने की कोशिश करेगा?

देश में सबसे ज्यादा वोटरों की संख्या किसान बिरादरी की है. हम आज भी है मानते हैं कि भारत के 60 पर्सेंट लोग खेती किसानी से जुड़े हुए हैं . यानी 60 फ़ीसदी वोटर भी वे लोग ही हैं, जो कहीं ना कहीं मोदी की कृषि नीति से प्रभावित हैं .कहने को मोदी ने किसानों की आय दोगुना करने का लक्ष्य निर्धारित किया है . स्वाइल हेल्थ कार्ड ,प्रधानमंत्री फसल बीमा, एमएसपी का 50 परसेंट बोनस और पूरे भारत की कृषि मंडी को नेटवर्क से जोड़ने का दावा सरकार कर रही है.

 

सरकार यह बता रही है किसानों का जीवन स्तर बहुत अच्छा हो गया है और इस रबी की फसल के बाद उनके घरों में पैसे की भी कमी नहीं रहेगी .विपक्ष यह बता रहा है , कि बाकी सारे मुद्दों की तरह प्रधानमंत्री का खेती के क्षेत्र में यह तमाम बड़ी घोषणाएं हवा-हवाई ही सिद्ध हुई हैं. धरातल पर किसान की स्थिति उसी तरह से खराब है जैसे पहले थी . किसान आज भी आत्महत्या कर रहा है . आज भी पैसे के लिए मोहताज बना हुआ है .

यदि दावे के अनुरूप किसानों की स्थिति अच्छी हुई होती तो भाजपा के लिए चुनाव जीतना बहुत ही आसान हो गया होता . वास्तव में ऐसी स्थिति है नहीं इसलिए यह कहना कि किसानों के बूते मोदी चुनाव जीत पाएंगे बहुत कठिन है.

खेती-बाड़ी से ही जुड़ा हुआ है मजदूरो का मुद्दा . इस मामले में अब तक मोदी सरकार की रिपोर्ट काफी खराब है .पहले गांव से पलायन कर मजदूर शहर गए, वहां भी मजदूरों का जीना मुहाल हो गसा. ना स्थाई रोजगार है ना लोगों के पास रहने खाने की व्यवस्था. नोटबंगी के कारण, मजबूरन मजदूर फिर से गांव की ओर लौट रहे हैं . वहा वही पुरानी हालात. भाजपा आखिर क्यों मान रही है कि खेतिहर मजदूर, असंगठित क्षेत्र के मजदूर मोदी को वोट करेंगे और 2019 में सरकार फिर से आ जाएगी.

हां गांवों में कुछ वोटर जरूर बने हैं, जिनके घरों में पहली बार गैस का सिलेंडर आया है, पहली बार बिजली का कनेक्शन आया है ,पहली बार जिनका आधार कार्ड बना है ,पहली बार बिना बिचौलिए को जिन्हें सरकारी लाभ प्राप्त हो रहा है . वे लोग भाजपा को और मोदी को सीधे वोट कर सकते हैं.

मोदी युवाओं में लोकप्रिय हैं जिनमें देश प्रेम का जज्बा है ,जो भारत की विदेशों में बढ़ती साख से खुश हैं, जो यह मानते हैं कि मोदी के रहते ही देश का उद्धार हो सकता है . वे मोदी के लिए 19 में फिर से वोट करने के लिए तैयार हैं ,लेकिन इनमें एक बहुत बड़ा फर्क है .

युवा जो मोदी की नीतियों के कारण बेरोजगार हुआ है जिसकी जिंदगी पहले से ज्यादा कस्टकर हो गई है, लेकिन फिर भी मोदी को लोग वोट करना चाहते हैं . मोदी की कश्मीर नीति , मोदी की पाकिस्तान नीति युवा वर्ग को भा रही है , वे मोदी को नेशनल आइकन मानते हैं .लेकिन क्या एक खास युवा वर्ग का वोट प्राप्त कर मोदी फिर से प्रधानमंत्री बन सकते हैं .युवा वर्ग में विभाजन करने वाली तमाम शक्तियां सक्रिय हैं .

जाति के नाम पर राजनीति करने वालों के लिए मोदी एक खलनायक हैं .सपा ,बसपा ,राजद ,तृणमूल जैसी पार्टियां कुछ खास जातियों एवं वर्गों के बीच अच्छी पैठ रखती हैं . मोदी का हिंदुत्व ,जाति विभाजन को तोड़ सकता है ,लेकिन इस बार हिंदुत्व चुनाव पर कितना हावी होगा यह देखना बाकी है.

साहूकारों, व्यवसायियों एवं उद्योगपतियों की पहली पसंद कभी भारतीय जनता पार्टी हुआ करती थी. कई बार तो लोगों ने भाजपा को बनियों की पार्टी तक कह डाला , लेकिन आज यही लोग भाजपा से सबसे ज्यादा परेशान हैं .नोटबंदी और जीएसटी दो ऐसे मुद्दे हैं.

जिनसे दिल से व्यापारी वर्ग बेहद परेशान है. लाखों लोगों के रोजगार बंद हो गए, लाखों लोग व्यापार बचाने के लिए अभी जूझ रहे हैं .पहली बार व्यापारियों का भाजपा से मोहभंग हुआ है. अब देखना बाकी है कि इन्हें भाजपा कैसे मना पाती है .

देश को मोदी की जरूरत है लेकिन लोगों को रोटी की भी जरूरत है . यह एक धारणा बन गई है कि मोदी के राज में रोटी कठिन हो गई है, रोजगार गायब हो गए हैं और तरह-तरह की बंदिशें लोगों पर लगाई जा रही है. मोदी के लिए सबसे राहत की बात यह है कि विपक्ष में कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो मोदी की पर्सनल्टी को चुनौती दे सकता है .लेकिन यह भी तथ्य है यदि जनता ठान ले तो सत्ता बदलने के लिए नेता की जरूरत नहीं है.

विक्रम उपाध्याय बिग वायर हिंदी के संपादक हैं