विमु्रदीकरण: तेरे फायदे, मेरे फायदे

December 29, 2016





विक्रम उपाध्याय

प्रधानमंत्री मोदी ने अब तक विमुद्रीकरण के एक हजार फायदे गिनवा दिए है। उनके मंत्री पीछे से कोरस की आवाज बने हुए हैं।

बावजूद इसके लोग एक दूसरे से पूछ रहे हैं – भाई नोटबंदी का क्या फायदा मिला।

पढ़े लिखे लोग आकड़ांे से एक दूसरे के सवालों का जवाब दे रहे हैं लेकिन कस्बों और गांवों के लोग तो अपने अनुभव से ही नतीजे निकाल रहे हैं।

इमानदारी की बात करें तो अभी 70 फीसदी से अधिक लोग इस नोटबंदी पर पूरी तरह ब्लैंक हैं। आगे का रास्ता किधर को जाएगा, अभी इसका ठीक ठीक आकलन किसी के पास नहीं है।

फिर भी कुछ फायदे और कुछ नुकसान से तो हर आदमी गुजर रहा है।

सबसे निचले पायदान पर खड़ा किसान और मजदूर वर्तमान से नहीं आने वाले समय को लेकर भयभीत है।

अखबारों में पढ़कर या टीवी पर देखकर वह जो समझ सका है उसके अनुसार अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो चुकी है और कम से कम छह महीने तक बनी रहेगी, यानी उत्पादन कम होगा ।

कल कारखाने के पहिये थम जाएंगे और नतीजा काम धाम के लाले पड़ जाएंगे। मजदूर तब तक खाएगा क्या। यह चिंता उसकी जायज और वाजिब है।

लेकिन उसके सामने सरकार के कुछ वायदे हैं उसमें उसे अपना फायदा दिख सकता है।

सरकार पांच हजार से अधिक के भुगतान को आॅन लाइन करने को अनिवार्य बनाने जा रही है।

इसका मतलब है कि मजदूर की मजदूरी का कमीशन और कम पैसे देकर अधिक पर दस्तखत करवाने के दिन लद जाएंगे।

मजदूर अपनी मेहनत का पूरा दाम और वह भी तुरंत पा सकेगा।

मजदूरांे को सरकार पर भरोसा होना चाहिए क्योंकि मनरेगा का भ्रष्टाचार इस सरकार ने पूरी तरह बंद करके दिखा दिया है। नोटबंदी के बाद का दृश्य कुछ और होगा।

प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री तक यह कह चुके हैं कि विमुद्रीकरण के बाद जिस तरह पैसा बैंकों में जमा हुआ है उसका उपयोग देश में ढांचागत सुविधाओं के विस्तार में किया जाएगा।

सड़के, पुल , रेल विस्तार, बिजली परियोजनाएं और बंदरगाहों के विस्तार पर खूब पैसे खर्च किए जाएंगे।

मजदूर वर्ग को इसका फायदा मिल सकता है कि उन्हंे एक ही जगह लंबे समय तक रोजगार मिल जाए। पर इन फायदों के साथ कुछ आशंकाएं भी जुड़ी हैं।

देश के कुल कामगार मजदूरों की संख्या लगभग 50 करोड़ है और इनमें से 90 फीसदी से अधिक मजदूर असंगठित क्षेत्र में लगे हैं।

नोटबंदी के बाद यह असंगठित क्षेत्र सबसे अधिक डंवाडोल स्थिति में होगा। निजी क्षेत्र पर विमुद्रीकरण का बुरा असर हुआ है।

शहर के शहर इससे प्रभावित हुए हैं, क्योंकि बी और सी कैटेगरी के अधिकतर शहरों में व्यापार नकद आधारित हुआ करता था।

अब एक दम सब कैशलेस हो जाए और उसी रफ्तार से चल पड़े ऐसा अभी कहा नहीं जा सकता।

मंडियों आढ़तों, गोदामों में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर अभी से ही बोरिया बिस्तर बांधने लगे हैं।

किसान बेचारे हैं और नोटबंदी के बाद भी बेचारे बने हुए हैं। रबी की बुवाई के ठीक ऐन वक्त पर यह यह विमुद्रीकरण का फैसला आया।

जैेसे तैेसे किसानों ने इधर उधर से जुगाड़ कर अपने खेतांे में बीज तो डाल दिए, लेकिन फसल के साथ मायूसी आएगी आएगी या खुशी इसे लेकर वे आश्वस्त नहीं हैं।

कारण इस नोटबंदी की पहली मार उन्हें ही झेलनी पड़ी है। साक सब्जी जिसे हम नकदी फसल कहते हैं वहीं बेनकदी की भेंट चढ़ गई।

आलू प्याज मटर गोभी किसी का भी दाम किसानों को नहीं मिला। उपभोक्ताओं ने हाथ क्या खींचे किसान कंगाल हो गए।

खेत में खड़ी फसलें उठाव का इंतजार कर रही हैं। किसान यदि जोखिम लेकर अपनी फसल मंडी मेें ले भी आ रहा है तो दाम नहीं मिल रहा और थक हार कर किसी भी भाव उसको टिका रहा है।

प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री चाह कर भी किसानों की मदद नहीं कर पा रहे हैं। बाजार आधारित व्यवस्था में पिसने वाले बस किसान रह गए।

पर किसानों को लगता है कि इस विमुद्रीकरण का अंततः उन्हीं को फायदा मिलने वाला है।

ई मंडी ओर ई पेमेंट के चलन मंे आते ही बिचैलिये गायब हो जाएंगे जो सदियों से किसानों के खून पीते आ रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे देश की मंडियों को इंटरनेट से जोड़ने का अभियान चला रखा है। पर किसान को इसका कितना फायदा मिलेगा यह वक्त ही बताएगा।

भारतीय किसानों की सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि उन्हंे अपनी जरूरतों के लिए रोज ही समझौते करने पड़ते हैं, ई मंडी उन्हें इन मजबूरियों से कहां तक बचाएगी, यह तो समय ही बताएगा।

नोटबंदी को लेकर नौजवान उत्साहित भी है और आशंकित भी।

उत्साहित इसलिए कि नयी व्यवस्था जहां सब कुछ उनके मोबाइल पर, वह भी प्रतिस्पर्धी मूल्य पर उपलब्ध होने वाला है और एक तरह से वह इस व्यवस्था का संवाहक बनने वाले हैं, ऐसे में उनके पास काफी संभावनाएं होंगी।

वह स्टार्टअप इंडिया का भी हिस्सा बन रहा है और मेकइन इंडिया का भी। नई व्यवस्था में उसके लिए बैंक आदि से लोन लेकर कुछ अपना शुरू करने का अवसर है और देश की तरक्की में हिस्सेदार बनने का सौभाग्य भी।

वह स्कल इंडिया के जरिये खुद भी और अपने जैसे कुछ लोगों को भी सुयोग्य बनाकर जीवन स्तर सुधार सकता है।

आशंका यह है कि बाजार के सिकुड़न से उसकी संभावनाएं उड़ान नहीं ले पाएंगीं। व्यापार में वह उन बड़ी कंपनियों के सामने नहीं टिक पाएगा जो भारी घाटा उठाकर भी अपने समय का इंतजार कर सकती हैं।

जहां तक काॅरपोरेट जगत का सवाल है तो उसके लिए यह अवसर दुधारी तलवार है।

एक तरफ बाजार में प्रतिस्पर्धा कम होने वाली है, कमजोर काॅरपोरेट किसी भी संभावित मंदी की स्थिति में खुद को टिकाए नहीं रख सकते, इसलिए छोटे व्यापार के बंद होने या बिक जाने की स्थिति का निर्माण हो सकता है।

लेकिन बड़े काॅरपारेट के लिए यह अवसर भुनाने का समय है।

कैशलेस पेमेंट व्यवस्था के लिए पहले से ही तैयार कंपनियों के लिए यह तो सुवअसर है।

बाजार में लगातार नये आकड़े आ रहे हैं जिससे यह पता चलता है कि किस कंपनी ने कितना बड़ा मैदान मार लिया है।

हां ये आकड़े राजनीतिक हमले के भी काम आ रहे हैं। ?

कुल मिलाकर भारत के लिए यह कैशलेस व्यवस्था कैसी होगी, यह जानना समझना बहुत जरूरी है।

सरकार के दावे और विपक्ष के आरोप के बीच कोई परिणाम निकाला जा सकता है तो यह कि भविष्य के सुहाने सफर के लिए वर्तमान को कुछ कुर्बानियां देनी ही होंगी।

विक्रम उपाध्याय बिग वायर हिंदी के संपादक हैं