कश्मीर – तोड़ने वाले से कहीं ज्यादा जोड़ने वाले हैं




 

विक्रम उपाध्याय

यारों —–जम्मूकश्मीर नहीं सिर्फ घाटी का कुछ हिस्सा उबल रहा है। यह मत कहो कि पूरे जम्मूकश्मीर राज्य से अलगाववादियों की आवाज सुनाई दे रही है, कश्मीर घाटी के कुछ सौ लोग ही पूरे भारत की नाक में दम कर रहे हैं। पाकिस्तान इन्हीं के बदौलत भारत को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा है। यहीं के कुछ नेताओं को आजादी के नारे लगाने और पत्थर बरसाने के पेसे मिल रहे हैं।

आप, हम, सबको यह जानने की जरूरत है कि जम्मूकश्मीर राज्य में कश्मीर घाटी का यह क्षेत्र सबसे छोटा है। इस राज्य के तीन प्रमुख संभागों में जम्मू संभाग 12,378 वर्ग किलोमीटर में लद्दाख संभाग 33,554 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में और कश्मीर घाटी संभाग केवल 8,639 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हैं। संख्या के दृष्टिकोण से भी घाटी संभाग जम्मू के बाद दूसरे स्थान पर लगभग 55 लाख की आबादी वाला क्षेत्र है, जहां आंतकवाद का बीज 80 के दशक में बोया गया और उसे अभी तक पनपने दिया गया।

Photo Credit: flowcomm - CC BY 2.0

Photo Credit: flowcommCC BY 2.0

घाटी का कुपवाड़ा जिला आंतकवाद का सबसे प्रमुख गढ़ है। यहीं से वर्ष 1988-89 में जम्मूकश्मीर लिबरेशन र्फ्रट ने अपनी शुरूआत की थी और यहीं से होकर ज्यादातर कश्मीरी आतंकवादी पाकिस्तान प्रशिक्षण के लिए जाते रहे हैं या वहां से प्रशिक्षित होकर भारत में घुसपैठ करते रहे हैं। कुपवाड़ा के बाद बारामुला सबसे ज्यादा आतंकवाद प्रभावित जिला है। पाकिस्तान की सीमा से लगे होने के कारण यहां से लगातार घुसपैठ होती रही है। इसी जिले में सोपोर है जहां, अक्सर आंतकवाद की घटनाएं सुनाई देती हैं।

श्रीनगर भी हालांकि घाटी में है, लेकिन यहां आतंकवाद की घटनाओं पर पुलिस और सेना के जवानों ने बड़ी मुस्तैदी से रोक लगा रखी है। यह जम्मूकश्मीर की राजधानी होने के नाते व्यापार और पर्यटन का भी बहुत बड़ा केंद्र हैं। लेकिन यहां से कुछ ही किलोमीटर दूर बडगाम भी आतंकवादियों का गढ़ है। पाकिस्तान में बैठा हिजबुल मुजाहिद्दीन का मुखिया सैयद सलाउद्दीन इसी जिले का रहने वाला है और यहां 1988-89 से ही आंतकवादी गतिविधियां संचालित कर रहा है।

यही हाला पुलवामा का भी है। यहां भी पाकिस्तानी समर्थक आंतकवादी अपनी जड़े जमा चुके हैं और अल जेहाद नाम का सेगठन तेजी से फैल रहा है। अनंतनाग वह जिला है जहां से सबसे अधिक आतंकवादी और अलगाववादी संगठित होकर भारत विरोधी अभियान चला रहे हैं। सबसे अधिक हिंसक घटनाएं भी यहीं हो रही हैं।

जम्मू कश्मीर में भले ही एक छोटे हिस्से में ही आतंकवाद की आग लगी हैं, लेकिन इसमें स्वाहा होने वालों की संख्या हजारों में है। साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के अनुसार वर्ष 1988 से 2016 तक जम्मू कश्मीर में कुल 43,994 लोगों की जान इस आतंकवाद ने ले ली है। इसमें 14,729 आम नागरिक, 6216 पुलिस व सेना के लोग और 23,049 आंतवादी शामिल हैं।

कृष्ण, पांडव और सम्राट अशोक से जुड़े इस कश्मीर में इस समय एक दर्जन दुर्दांत आंतकवादी संगठन सक्रिय हैं। उनमें प्रमुख हैं- अलबदर, अलउमर मुजाहिद्दीन, दुख्तर ए मिल्लत, हरकत उल मुजाहिद्दीन, हरकत उल जेहाद ए इस्लामी, हिज्ब उल मुजाहिद्दीन, जम्मू एंड कश्मीर इस्लामिक फ्रंट, लश्कर ए तैय्यबा और कुछ छ्दम नाम भी।

इनको राजनीतिक समर्थन और धन मुहैया कराने वालों मंे आॅल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस, जम्मूकश्मीर लिबरेशन फ्रंट, लश्कर ए जब्बर, लश्कर ए उमर, मुताहिदा जेहाद काउंसिल और तेहरिक उल मुजाहिद्दीन जैसे संगठन हैं। सीमा पार से जकात के नाम पर लिए गए धन और हथियार मुहैया कराने वालों में पाकिस्तान सरकार, हाफिज सईद, आईएसआई, जैश ए मुहम्मद और अरब के कुछ संगठन शामिल हैं।

यह कयास लगाना मुश्किल नहीं है कि आखिर इतने छोटे हिस्से में इतनी वारदातें कैसे हो सकती हैं। कारण कई हैं और उनमें सबसे प्रमुख कारण है पाकिस्तान द्वारा लगातार कश्मीरी युवकों को भड़काने की कार्रवाई और भारत के खिलाफ लड़ने के लिए उन्हें खूब सारा पैसा और ऐश करने की छूट प्रदान करना है।

कुछ वर्ष पहले तक पाकिस्तान यही काम भाड़े के ट्टुओं से कराता था, लेकिन जब से घुसपैठ पर मोदी सरकार ने लगाम लगाई। सीमा पर ही घुसपैठिये मारे जाने लगे तब से पाकिस्तान सरकार, आईएसआई और उनके यहां बैठे कश्मीर केे एजेंट स्थानीय लड़कों को जिहाद के लिए तैयार करने में जुट गए हैं।

खुलेआम यह प्रचारित किया जा रहा है कि कश्मीर में भारतीय फौज के खिलाफ जंग के लिए जो तैयार होगा उसके बच्चे रिश्तेदारों और नजदीकी लोगों को न सिर्फ पैसे की मदद दी जाएगी, बल्कि उनके पढ़ने के लिए पाकिस्तान के काॅलेजों में आरक्षण भी किया जाएगा। इसी लोभ लालच और डर का परिणाम है कश्मीरी युवकों का अचानक भारत के प्रति बागी होना।

पाकिस्तान की इस कोशिश के बावजूद अभी भी स्थानीय युवकों का आंतकवादी बन जाने का उदाहरण कोई बहुत बड़ा नहीं है। वर्ष 2013 में जहां 31 कश्मीरी युवक बंदूक थाम कर आतंक की राह पर चल निकले थे वहीं 2015 के अत तक भी केवल 70 लड़कों के ही आंतकवादी बनने की खबर है। जाहिर है इस हंगामें के पीछे तत्कालिक कारण हैं न कि कोई ठोस वजह।

यह ठीक है कि कश्मीर में इस समय बेरोजगार नवयुवकों की संख्या लगभग 10 लाख के आस पास है, लेकिन यह किसी भी राज्य से कम बेरोजगारी का आकड़ा है। बेरोजगारी ही किसी के द्वारा किसी की हत्या की वजह होती तो भारत के आधे राज्य इसी रास्ते पर चल रहे होते।

जिस कश्मीर को भारत से अलग करने के प्रयास में कुछ भटके लोग और कुछ शातिर दिमाग लगे हैं उसी कश्मीर को भारत के साथ बनाए रखने और भारत की सेवा करने के जज्बे वाले लोग भी हैं। बुरहान का नाम लोगों की जुबान पर चढ़ाने के लिए जिम्मेदार मीडिया को ऐसे लोगों की सेवाआं के बारे में भी बताना चाहिए। नई पीढ़ी में रूबेदा ऐसी शख्सियत हैं जिन्हें कश्मीर की पहली महिला आईपीएस होने का गर्व प्राप्त है। यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है, बल्कि वर्ष 2015 में कश्मीर घाटी से सात युवक युवतियां भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य बनें।

लोगों को यह जानने की आवश्यकता है कि एक तरफ कुछ दर्जन लोग कश्मीर में भारत के खिलाफ लड़ रहे हैं तो वहीं साढ़े तीन लाख से अधिक जम्मूकश्मीर में वे कर्मचारी हैं जो भारत के संविधान को मानकर उसकी रक्षा करने और उसे अक्षुण्ण रखने का व्रत लेते हैं। लगभग 90 हजार कश्मीरी पुलिस बल में हैं जो दिन रात सीमा के भीतर लोगों की जान माल की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

कुछ हजार लोग इस्लाम के कारण पाकिस्तान में कश्मीर का विलय या उसे आजाद करने की मांग कर रहे हैं तो उसी घाटी में सदियों से रह रहे लगभग दस हजार कश्मीरी पंडित घाटी से निकाल दिए जाने के बाद भी उसी मिट्टी और उसी संस्कृति से प्यार और मोहब्बत ही नहीं करते, बल्कि उसके लिए मर मिटने के लिए तैयार हैं।

दोस्तों यह कश्मीर भारत के प्राचीन इतिहास का जिंदा मिसाल ही नहीं बल्कि हर भारतीय के लिए देश का मस्तक हैं । कुछ लोगों की जिद या भटकाव के चलते इसे दागदार और अहलदा नहीं मान सकते।

bikram
 
विक्रम उपाध्याय बिग वायर हिंदी के संपादक हैं